स्वच्छ ऊर्जा अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति का भी अहम हिस्सा बन चुकी है। ई-20 ईंधन, और हाइड्रोजन ट्रेन जैसी पहलों के बीच देश बिजली उत्पादन में भी सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा रहा है। भारत ने वर्ष 2030 और 2070 के लिए कई बड़े लक्ष्य तय किए हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है, प्रदूषण घटता है और पर्यावरण को नुकसान भी कम पहुंचता है।
पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा के तेज विस्तार ने भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता को लगभग दोगुना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज सौर ऊर्जा पवन, जलविद्युत और बायोमास को पीछे छोड़ते हुए देश का सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत बन चुकी है। इससे भारत कम-कार्बन ऊर्जा व्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
भारत ने नवंबर 2021 में ग्लासगो में आयोजित कॉप-26 सम्मेलन के दौरान ‘पंचामृत’ लक्ष्य घोषित किए। यही लक्ष्य भारत की स्वच्छ ऊर्जा नीति का रोडमैप माने जाते हैं।
इन लक्ष्यों के तहत;
कुल स्थापित बिजली क्षमता में 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म हिस्सेदारी का लक्ष्य भारत लगभग पांच वर्ष पहले ही हासिल कर चुका है। हालांकि 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता का लक्ष्य अभी पूरा किया जाना बाकी है।
सरकार के अनुसार, 2014 में भारत की सौर ऊर्जा क्षमता केवल 3 गीगावाट थी। अक्तूबर 2025 तक यह बढ़कर 129.92 गीगावाट हो गई, यानी लगभग 40 गुना से अधिक वृद्धि हुई। सौर ऊर्जा क्षमता का स्वरूप इस प्रकार है;
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